वक्त का तक़ाज़ा

Hindi PU

चलो, आज कुछ यूँ कर लें

बीते हुए को भुला,

अजनबी हो जाएंँ,

खूबसूरत रिश्तों को दफ़न कर

उन का मरसिया गा दें,

या

उन्हें अग्नि दिखा कर

राख गहरे समुन्दर में बहा दें

फिर उस जगह मिट्टी का लेप कर

सब कुछ मिटा दें,

एहसास साँस न ले पाएँ

तमन्नाएँ सिर न उठा पाएँ

आओ हम-तुम

सहरा हो जाएँ

जहाँ प्यार की बूँदें

गिरें भी, तो

जल कर धुआँ हो जाएँ

आओ अपने ऊपर

बबूल उगा लें

स्नेह की उंगलियाँ

बढ़ें भी, तो

रक्त-रंजित हो जाएँ,

रेत की नींव पर बने

ख्वाबों के महल

खण्ड-खण्डित हो जाएँ

चलो आओ ओढ़ लें

अंहकार का लबादा,

अना का नाकाब,

और दुनियादारी के

सींग उगा कर

ऐसे विचरें कि

नज़दीक से गुजरें

तो झ्क-दूजे से

खौफज़दा हो जाएँ

चलो, आज यूँ  ही कर ले

वक्त का यही तक़ाज़ा है

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Posted in Causes, Poem by Narinder Jit at June 12th, 2017.
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